सनातन धर्म मे एक सूती धागे जैसी वस्तु अधिकाँश व्यक्ति धारण करते है इस का आध्यत्मिक उत्थान के लिए अत्यधिक महत्व है, क्योंकि इस सूत्र को धारण करने के पश्चात कोई व्यक्ति अपने धार्मिक कर्त्तव्यों के निर्वहन के लिए सक्षम हो जाता है।
सनातन धर्म के " उपनयन सँस्कार " में जनेऊ धारण कराया जाता है, 'यज्ञोपवीत धारण करने वाले व्यक्ति को समस्त नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है'।
उपनयन का शाब्दिक अर्थ है, "सन्निकट ले जाना" और उपनयन संस्कार का अर्थ है- "ब्रह्म (ईश्वर) और ज्ञान के निकट ले जाना"
अतः इसका अर्थ ये है कि उपनयन सँस्कार के जिसमे यज्ञोपवीत धारण करने के पश्चात विद्यारम्भ, यज्ञ करने और स्वाध्याय का अधिकार प्राप्त होता था।
यज्ञोपवीत धारण करने के पश्चात वह द्विज कहलाता था द्विज अर्थात जिसका दूसरा जन्म हुआ है( प्रथम जन्म पृथ्वी पर आना और द्वितीय अपने धर्म मे प्रवेश करना)
एक भ्रांति ये है कि मात्र ब्राह्मण ही जनेऊ धारण कर सकता है परन्तु समाज का प्रत्येक वर्ग अथवा हिन्दू का कर्तव्य है जनेऊ धारण करना जो नही करता वो वर्ण व्यवस्था के अनुसार शूद्र माना जाता है।
दूसरी भ्रांति ये है कि लड़कियों या स्त्रियाँ जनेऊ धारण नही कर सकती जिन लड़कियों को आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करना है वो अवश्य ही जनेऊ धारण कर स्वयं साधना कर सकती हैं।
ब्रह्मचारी तीन सूत्र का जनेऊ और गृहस्थ 6 सूत्र का जनेऊ पहनता है
यज्ञोपवीत के छह धागों में से तीन धागे स्वयं के और तीन धागे पत्नी के बतलाए गए हैं।
जनेऊ का आध्यात्मिक महत्व
जनेऊ में तीन-सूत्र
त्रिमूर्ति :- ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक
त्रिऋण :- देवऋण, पितृकण और ऋषिऋण के प्रतीक
त्रिगुण :- सत्व, रज और तम के प्रतीक होते है
जनेऊ के सूत्र के तंतु और उनका महत्व
जनेऊ के एक-एक सूत्र में तीन-तीन तंतु होते हैं,अत: तंतुओं की संख्या नौ होती है ये 9 तंतु 9 छिद्रों का प्रतीक माने जाते है( एक मुख, दो नासिका, दो नेत्र दो कर्ण, मल और मूत्र के दो द्वार मिलाकर कुल नौ होते हैं)
इनका अर्थ है हम मुख से उत्तम वचन बोले और सात्विक भोजन ग्रहण करें, नेत्रों से उत्तम दर्शन करें और कर्ण से उत्तम श्रवण करें
जनेऊ की गाँठ
जनेऊ में पांच गांठ लगाई जाती है जो ब्रह्म, धर्म, अर्ध, काम और मोक्ष का प्रतीक है।
ये पांच यज्ञों , पांच ज्ञानेद्रियों और पंच कर्मों के भी प्रतीक है।
जनेऊ धारण करने के कारण
यह आयुवर्धक, स्फूर्तिदायक, बंधनमुक्त करने वाला और पवित्रता देने वाला है, यह बल और तेज भी देता है।
इस यज्ञोपवीत के परम श्रेष्ठ तीन लक्ष्य हैं- सत्य व्यवहार की आकांक्षा, अग्नि के समान तेजस्विता और दिव्य गुणों की पवित्रता इसके द्वारा सरलतापूर्वक प्राप्त की जा सकती हैं।
अंततः
इस सूत्र को धारण करने से कई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभ भी होते हैं।
सँस्कार में वृद्धि, आचरण में शुद्धता, शुचिता इत्यदि इसके प्रमुख नियम है।
इसे धारण करने से मनुष्य पवित्रता की ओर उन्मुख होता हैं।
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